गुरु पूर्णिमा पर भाषण : Guru Purnima Speech in Hindi l Marathi l Gujarati

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गुरुपूर्णिमा पर भाषण : Guru Purnima Speech in Hindi l Marathi l Gujarati

Speech on Guru Purnima in Hindi : दोस्तों आज हमने दोस्ती  दिवस पर भाषण कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 & 12 के विद्यार्थियों के लिए लिखा है. Get Some Speech on Gupu Purnima in Hindi for class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11 & 12 Students.

आदरणीय प्रिंसिपल सर, सभी शिक्षकगण, सहपाठियों और अभीभावकों को मेरा नमस्कार। मैं आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ।

मेरा नाम…..है. मैं कक्षा… में अध्ययन करता हूं। आज हम सभी “गुरु पूर्णिमा पर्व” मनाने के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं। यह पर्व हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ (जून- जुलाई) के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को  मनाया जाता है। इस अवसर पर मैं एक भाषण प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

गुरु पूर्णिमा को वेद्यास पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है जिसे वेदव्यास के जन्मदिन पर मनाया जाता है। दोस्तों आज इस आर्टिकल से हम गुरु पूर्णिमा की क्या महत्व है, इसे क्यों मनाया जाता है, और मनाने के लिए  कारण जानेंगे।

जैसे नाम से स्पष्ट होता है ,ये गुरु पूर्णिमा पर्व गुरु के लिए समर्पित है। गुरु पूर्णिमा शब्द किसी भी कार्य की या भाव कि पूर्णता को प्रदर्शित करता है। जिस में कुछ भी अधूरा ना रहे, पूरी गुणों के और भावों के ज्ञान का समावेश हो।

गुरु पूर्णिमा का अर्थ : जिस में कुछ भी अधूरा ना रहे, पूरी गुणों के और भावों के ज्ञान का समावेश हो l

संस्कृत में एक श्लोक है :

“Guru Brahma Guru Vishnu Gurudevo Maheshwaraha
Gurhu sakshat Parambrahma tasmai Shri gurave namaha.”

“गुरूर  ब्रह्मा गुरूर विष्णु: गुरूर देवो महेश्वर: गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”

इस से हमे ये पता चलता है कि गुरु को साक्षात् ब्रह्माविष्णु और महेशवर का साक्षात् रूप माना जाता है। अपनी समक्ष में इस परब्रह्म को पुनारादर के साथ नमन करता हूं।

भारत विभिन्नताओं से भरा देश है। जिसमें सभी लोगों के मनोभावनाओं को व्यक्त करने के लिए अलग-अलग त्योहार होते है। सबसे पहले मै आपको बतादू गुरु पूर्णिमा जो है वह महाभारत के रचयिता कृष्ण देव पयान व्यास का जन्म दिन भी है। व्यास संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान थे।जिन्होंने चारों वेदों की रचना की। इसलिए इनका नाम वेदव्यास भी है। इनकी ही सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा की नाम से भी जाना जाता है।

भारतीय संस्कृति में गुरु का को सम्मान है। वह भगवान तुल्य माना जाता है। या हम ऐसा कहे की गुरु को ही भगवान माना गया है। गुरु ही हमारे जीवन से अज्ञान अंधकार को मिटाता है। गुरु हमे इस लायक बनाते है कि हम हमारी जीवन को सही तरह से,सही दिशा में और सही अर्थों के साथ जी सके।

गुरु पूर्णिमा पूरे देश में धूम दाम से मनाया जाता है। अशाड मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। इस दिन सभी अपने गुरु के प्रति आदर और सम्मान प्रकट करते है। इस साल 2020 में गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई को मनाया जाता है।

असली गुरु कैसे पाएं 

गुरु दिव्य व्यक्तित्व है और हमारे पास भौतिक बुद्धि है। इसलिए जब हम अपनी भौतिक बुद्धि के साथ प्रयास और मूल्यांकन करते हैं, तो हम बाहरी चीजों को देखते हैं। क्या वह पतला है या वह मोटा है, क्या वह लंबा है या वह छोटा है ? क्या वह भगवा पहनता है या वह सफेद पहनता है ?

आप जानते हैं कि हम बाहरी चीजों को देखते हैं और इस तरह हम यह अनुमान लगाते हैं कि यह महात्मा कितना ऊँचा है? लेकिन यह गुरु को खोजने का माध्यम नहीं है। आप देख सकते हैं, आप गुरु के सामने जाकर खड़े हो सकते हैं। तुम्हें कुछ नहीं होगा, क्योंकि तुम जिस तरह से गुरु से लाभान्वित हो रहे हो। ऐसा तब है जब आपको अंदर से विश्वास है।

गुरु और शिष्य का संबंध भौतिक नहीं है। यह आंतरिक विश्वास, समर्पण और भक्ति पर निर्भर है। श्रीकृष्ण कहते हैं (भगवद गीता से कविता) अर्जुन मैं हर किसी के दिल में बैठा हूं और मुझसे ज्ञान, स्मरण और विस्मरण आता है। ताकि विश्वास भगवान आपको वही प्रदान करे जो आप योग्य हैं। ठीक है ? इसलिए गुरुओं को खोजने के बजाय, हम कोशिश करते हैं और अपना निर्माण करते हैं।

अगर आपकी खुद की इच्छा दूषित है, “ओह, मैं यह चाहता हूं, मैं चाहता हूं कि, मैं निशंक भक्ति नहीं चाहता, मुझे कुछ रहस्यवादी क्षमताएं चाहिए तो भगवान हमें कहीं और ले जाएंगे। हम विश्वास पैदा करेंगे कि वहाँ अच्छी तरह से था। दस साल के बाद हम पाते हैं कि हम ठगे गए हैं, हम गुरु को दोषी ठहराएंगे।

लेकिन वास्तव में धोखा देने की प्रवृत्ति हमारे अंदर थी। इसलिए अपने आप में आप ईश्वर और निस्वार्थ भक्ति के लिए ईमानदार प्यास विकसित करें। निस्वार्थ भक्ति का अर्थ है, यह नहीं कि मैं भक्ति का आनंद लेना चाहता हूं। मैं सेवा करना चाहता हूं, मैं देना चाहता हूं। जब ऐसा लगता है कि आप तैयार हैं जैसा कि कहा जाता है “जब छात्र तैयार हो जाता है तो शिक्षक अपने आप आ जाता है”। तुम पाओगे कि देवताओं की कृपा से तुम गुरु पाओगे।

हर इंसान को अपनी अंदर की गुरु को पहचानना चाहिए। हम सब की ज़िन्दगी में सबसे पहले गुरु होते है अपने माता पिता

गुरु वो होता है जिनसे हम कुछ अच्छा सीख सके। चाहे वो हम से उम्र में छोटा हो ,हमसे समान हो या फिर बड़ा हो। हम हमेशा हमारे पहले गुरु अपनी माता पिता का सम्मान करना चाहिए। हम सब को अलग अलग स्थिति में अलग अलग गुरु होते है। लेकिन सारे गुरुओं का मतलब एक ही होता है वो है अच्छाई को पहचानना और धर्म मार्ग पर चलना।

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आषाढ शुद्ध पौर्णिमेला म्हणजे या तिथीला आपण गुरुपौर्णिमा म्हणून गौरवितो.

आषाढ शुद्ध पौर्णिमेला गुरुपौर्णिमा किंवा व्यासपौर्णिमा म्हणतात. ज्यांनी महाभारत, पुराणे लिहिली त्या व्यासमुनींना वंदन करण्याचा, त्यांची पूजा करण्याचा हा मंगलदिन आहे. त्यांच्याएवढे श्रेष्ठ गुरुजी, आचार्य अद्याप झालेले नाहीत, अशी आपली श्रद्धा आहे. अशा या आचार्यांना साक्षात देवाप्रमाणे मानावे असे शास्त्रात कथन केले आहे.

एवढेच नव्हे तर महर्षी व्यास हे भारतीय संस्कृतीचे शिल्पकार आणि मूलाधार मानले जात. ज्या ग्रंथात धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, व्यवहारशास्त्र, मानसशास्त्र आहे, असा सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ त्यांनी लिहिला. ज्ञानियांचा राजा म्हणून ज्याला मानतात, त्या ज्ञानदेवांनीसुध्दा ज्ञानेश्वरी लिहिताना ‘व्यासांचा मागोवा घेतू’ असे म्हणून सुरुवात केली.

व्यासपौर्णिमेच्या दिवशी ‘ओम नमोस्तुते व्यास, विशाल बुद्धे’ अशी प्रार्थना करून, त्यांना प्रथम वंदन करण्याचा प्रघात आहे, परंपरा आहे. आपल्या देशात रामायण-महाभारत काळापासून गुरु-शिष्य परंपरा चालत आली आहे. आपण ज्यांच्याकडून विद्या प्राप्त करतो, मिळवतो, त्याच विद्येच्या बळावर आपण सर्वांचा उद्धार करीत असतो.

अशा या गुरूंना मान देणे, आदराने कृतज्ञता व्यक्त करणे हे आपले आद्य कर्तव्य होय. महर्षी व्यासांपासून अशी प्रथा रूढ झाली, ती आजमितीपर्यंत.

आपण कोणाचे तरी शिष्य आहोत, या भावनेत एक कृतज्ञता वाटते. भारतीय गुरुपरंपरेत गुरु-शिष्यांच्या जोड्या प्रसिद्ध आहेत. जनक-याज्ञवल्क्य, शुक्राचार्य-जनक, कृष्ण, सुदामा-सांदिपनी, विश्वामित्र-राम, लक्ष्मण, परशुराम-कर्ण, द्रोणाचार्य-अर्जुन अशी गुरु-शिष्य परंपरा आहे. मात्र एकलव्याची गुरुनिष्ठा पाहिली की, सर्वांचेच मस्तक नम्र झाल्याशिवाय राहत नाही.

भगवान श्रीकृष्णांनी गुरूच्या घरी लाकडे वाहिली. संत ज्ञानेश्वरांनी वडीलबंधू निवृत्तीनाथ यांनाच आपले गुरु मानले, तर संत नामदेव साक्षात विठ्ठलाशी भाष्य करीत असत. त्या नामदेवांचे गुरु होते विसोबा खेचर. भारतीय संस्कृतीत गुरूला नेहमीच पूजनीय मानले आहे.

गुरुपौर्णिमा ही सद्गुरूंची पौर्णिमा मानली जाते. पौर्णिमा म्हणजे प्रकाश. गुरु शिष्याला ज्ञान देतात. तो ज्ञानाचा प्रकाश आपल्यापर्यंत पोहोचावा, म्हणून गुरूची प्रार्थना करावयाची, तो हा दिवस होय.

गुरु म्हणजे ज्ञानाचा सागर आहे. जलाशयात पाणी विपुल आहे, परंतु घटाने-घागरीने आपली मान खाली केल्याशिवाय म्हणजे विनम्र झाल्याशिवाय पाणी मिळू शकत नाही. त्याप्रमाणे गुरूजवळ शिष्याने नम्र झाल्याविना त्याला ज्ञान प्राप्त होणार नाही, हे सर्वांनी लक्षात ठेवावे. ‘गुरु बिन ज्ञान कहासे लाऊ?’ हेच खरे आहे.

गुरूंच्या उपकारांनी आपले मन कृतज्ञतेने भरून येते, तेव्हा आपल्या तोंडून श्लोक बाहेर पडतो –

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ll
गुरु साक्षात परब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नमः ll

संदर्भ : सनातन संस्थानिर्मित ग्रंथ ‘ सण,धार्मिक उत्सव व व्रते ‘

गुरु-शिष्यांच्या गोष्टी वाचण्यासाठी येथे टिचकी मारा.

अनेक विद्यालयांतून, महाविद्यालयांतून श्रद्धाशील विद्यार्थी आपापल्या गुरुजनांसमोर या दिवशी विनम्र भावनेने नतमस्तक होतात. वेगवेगळ्या पंथोपपंथांतून ईश्वरभक्तीकडे जाण्याचे मार्ग शोधणारे मुमुक्षू-पारमार्थिक या दिवशी आपल्या गुरुंचे भक्तिभावाने पूजन करतात. ज्यांना या ना त्या कारणांमुळे गुरुंचे समक्ष दर्शन वा सहवास घडू शकत नाही ते त्यांच्या प्रतिमेची पूजा करतात.


Guru Purnima Speech in Gujarati 

ભારતમાં યોજાયેલી સૌથી મહત્વપૂર્ણ તહેવારોમાં ગુરૂ પૂર્ણિમા છે. તે બૌદ્ધ માટે એક તહેવાર છે. ગુરુ પૂર્ણિમા મૂળભૂત રીતે એક રસ્તો છે જેના દ્વારા વિદ્યાર્થીઓ તેમના ગુરુ અથવા શિક્ષક પ્રત્યેના પ્રેમ અને કૃતજ્ઞતા દર્શાવે છે. આ તહેવાર હિન્દૂ કૅલેન્ડર મુજબ ઉજવાય છે, જે અશાદના પ્રથમ પૂર્ણ ચંદ્ર દિવસ પર છે અથવા અંગ્રેજી કૅલેન્ડર મુજબ જુલાઈનો મહિનો છે. ભારતીય વિજ્ઞાન મુજબ, ગુરુ શબ્દ બે સંસ્કૃત શબ્દો “ગુ” અને “રૂ” જેનો અર્થ ભૂતપૂર્વ અર્થ અજ્ઞાનતા અને એક વ્યક્તિમાં અંધકાર અને પછીનો અર્થ છે જે દૂર કરે છે એટલે ગુરુનો અર્થ એ વ્યક્તિ છે હિન્દુ ધર્મ અનુસાર, ગુરુ પૂર્ણિમાનો તહેવાર ગુરુ વ્યાસને ઉજવવામાં આવે છે. ગુરુ વ્યાસ એ વ્યક્તિ છે જેમણે 4 વેદ, 18 પુરાણ અને મહાભારત લખ્યા છે.

ગુરુ પૂર્ણિમાની ઉજવણી લોકો દ્વારા જોઈ શકાય તે કંઈક છે. ત્યાં ઘણી શાળાઓ છે જે પરંપરાગત રીતે આ તહેવારને ગુરુના પગ ધોવાથી ઉજવે છે, જેમાં હિનુ શબ્દને “પદપુજા” કહેવામાં આવે છે. તે પછી શિષ્યો દ્વારા આયોજીત ઘણા કાર્યક્રમો છે જેમાં શાસ્ત્રીય ગીતો, નૃત્ય, હવાન, કીર્તન અને ગિઆના પઠનનો સમાવેશ થાય છે. ફૂલોના સ્વરૂપમાં વિવિધ ભેટો અને ગુરુને આપવામાં આવેલા “ઉતરિયા” (એક પ્રકારનું ચોરી)
બીજી તરફ બૌદ્ધ લોકો તેમના આગેવાન ભગવાન બુદ્ધના માનમાં આ દિવસે ઉજવે છે. તેઓ આ દિવસે ચિંતન કરે છે અને ભગવાન બુદ્ધની ઉપદેશો વાંચે છે. તેઓ “ઉપોસ્તા” નું પણ પાલન કરે છે, જે આ દિવસે એક બૌદ્ધ સંપ્રદાય છે.


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જય શ્રી કૃષ્ણ, બધા શિક્ષકગણ અને મારા પ્રિય મિત્રોને ગુરુપૂર્ણિમા ના દિવસે અભિનંદન.

અષાઢ સુદ પુનમ જે વર્ષ ની સૌથી મોટી પુર્ણિમા એટલે કે ગુરુપૂર્ણિમા કહે છે.  

શાસ્ત્રોમાં ગુરૂ નો મતલબ સમજાવતાં લખ્યું છે કે, ‘ગુ’ એટલે અંધકાર અને ‘રૂ’ એટલે તેનો નિરોધક મતલબ પ્રકાશ. મતલબ બે અક્ષરોથી મળીને બનેલ ‘ગુરૂ’ શબ્દનો અર્થ છે ‘ગુ’ મતલબ અંધકાર અને ‘રૂ’ મતલબ તેને દૂર કરનાર. શિષ્યમાં અજ્ઞાન રૂપી અંધકારને દુર કરી જ્ઞાન રૂપી દિપક પ્રગટાવનાર ગુરુ એક જીવન શિલ્પી મહાપુરુષ છે. જેમની અંદર પ્રકાશની શોધ પેદા થઇ છે, ગુરૂ એ છે કે અજ્ઞાનતા દૂર કરે છે. ગુરૂ એ છે જે ધર્મનો માર્ગ બતાવે છે. ગુરુ મોક્ષનો સાચો રાહ બતાવનાર ભોમિયો છે.  

મનુષ્યનો પ્રથમ ગુરૂ મનુષ્યને જન્મ અને સંસ્કાર આપનાર માતા પછી એને શિક્ષિત કરનાર શિક્ષક-ગુરુનું સ્થાન વિશિષ્ઠ છે. આપણી સંસ્કૃતિ અને ધર્મની ઈમારતનો પાયો જ્ઞાન છે. જ્ઞાન મેળવવા માટે ગુરુનું હોવું અતિ આવશ્યક છે. ગુરુ બિન નહીં જ્ઞાન. ગુરુ જ પોતાના શિષ્યોને નવજીવન માટે તૈયાર કરે છે.

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